एक रहस्यमय यात्रा : संजय म्यूजियम, जयपुर

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संजय म्यूजियम

इस पोस्ट को मैं हिंदी में लिखने का प्रयत्न इसलिए कर रहा हूँ , क्यूंकि यह पोस्ट भारत देश से जुडी हुई है. हालांकि इस ब्लॉग पर लिखी और कहानियां भी भारत से जुडी हैं, पर मेरा उद्देशय इस पोस्ट के द्वारा अपनी राष्ट्रभाषा से जुड़ना भी है, और १५ अगस्त से अच्छा दिन और कोई नहीं हो सकता. वह दोपहर का समय था जब मैंने अपने परिवार के साथ संजय म्यूजियम में प्रवेश किया. एक तरफ जहाँ म्यूजियम के गेट के बाहर रंग-बिरंगे पोशाखों में सजे ऊँट अपनी सवारी की प्रतीक्षा कर रहे थे वहीँ दूसरी ओर मान सागर के शिथिल जल के ऊपर जल महल की साफ़ परछाई बिखरती हुई दिख रही थी. मुझे थोड़ा भी ज्ञान नहीं था की आज मेरी भेंट मेरे धरोहरों से होने वाली है.


संजय म्यूजियम का इतिहास

Sanjay Museum

संजय म्यूजियम का इतिहास चाहे एक शतक पुराना ही क्यों न हो, किन्तु इसके अंदर छिपी हुई कहानियां सदियों पुरानी हैं. शायद किसी ने आज तक इतिहास की तहों तक जाकर उसको इतनी सच्चाई से जानने की कोशिश नहीं की है,जितना की इस म्यूजियम के सूत्रधार तथा स्नस्थापक श्री राम कृपालु शर्मा ने की है. इस म्यूजियम का नाम श्री राम कृपालु के छोटे सुपुत्र संजय शर्मा के नाम पर १९८२ में उनकी अकाल मृत्यु के बाद रखी गयी. १९५४ में स्थापित किये गए इस म्यूजियम में १,००,००० से भी अधिक हस्तशिल्प हैं जो पुरातन भारत की शायद एक मात्र धरोहर हैं. ६० साल के इस अद्भुत यात्रा में आज के भारत के लिए बहुत से ऐसे सन्देश हैं, जिन्हे सिर्फ जानने की नहीं, अपनाने की भी ज़रुरत है.


 क्या रहस्य है इन दीवारों के पीछे?

Sanjay Museum

संजय म्यूजियम की कॉपीराइट्स के कारण मैं म्यूजियम के अंदर के चित्र तो नहीं ले पाया, पर उसकी दीवारों के पीछे की अनोखी कहानियां अब भी मेरे साथ हैं. सबसे पहले म्यूजियम की लॉबी में गाइड ने हमारा स्वागत किया. दुबली पतली सी कद काठी वाला ये गाइड अपने आप में चलती फिरती इतिहास की किताब था. एक समतल स्वर में बोलता हुआ वो ऐसा लगता था, मानो उसे इतिहास से वर्तमान में सत्य का विवरण करने के लिए भेजा हो.

संजय म्यूजियम की लॉबी में कुछ वक़्त निकालने के बाद गाइड सभी आगंतुकों को म्यूजियम के अंदर के गलियारे की तरफ जाने का निर्देश देता है. उस गलियारे की दोनों दीवारों पर विशालकाय और अद्भुत डिज़ाइन के चित्र लगे हुए थे जिनको एक नज़र में समझना मुश्किल था.


खेल खेल में मोक्ष

हम सभी ने अपने बचपन में सांप सीढ़ी तो ज़रूर खेला होगा. किन्तु इस खेल का हमारे जीवन से बहुत गहरा सम्बन्ध है. सांप सीढ़ी खेल का जन्म १३ वी शताब्दी में संत ज्ञानदेव द्वारा किया गया था. सांप सीढ़ी का असली नाम मोक्षपत या मोक्षपतम भी है. से लेकर १०० तक के खाने वाले इन सांप और सीढ़ियों की श्रृंखलाओं में हर सांप और सीढ़ी का अपना महत्त्व है. हर अंक पर रखी सांप या सीढ़ी मनुष्य का कोई न कोई गुण दर्शाती है;

जैसे की – १२ अंक आस्था, ५१ अंक विश्वसनीयता, ५७ उदारता, ७६ ज्ञान तथा ७८ अंक वैराग्य को दर्शाता था. इसी प्रकार सांप वाले अंकों का भी महत्व है. ४१- अवज्ञा, ४४ – अहंकार, ४९- असभ्यता, ५२- चोरी, ५८ – मिथ्या, ६२- मद्य, ६९- उधारी, ७३- हत्या, ८४- राग, ९२ – लालच, ९५ – गौरव, और ९९ – काम प्रवृत्ति को दर्शाता है. मनुष्य को अपने जीवन में इन गुणों पर विजयी होते हुए मोक्ष की तरफ बढ़ना होता है. यही हर मनुष्य का गंतव्य है. १०० की प्राप्ति का अर्थ है – मोक्ष

मूल शब्दों में सांप मनुष्य के अवगुण तथा सीढ़ियां सद्गुणों को दर्शाती हैं और अच्छे कर्म मनुष्यों को मोक्ष की तरफ तथा बुरे कर्म मनुष्य को पृथ्वी पर पुनर्जन्म की ओर ले जाते हैं. एक सहज सा खेल जीवन के कितने गूढ़ रहस्य को छिपाये हुए था, जिसको समझने में मेरे जीवन का आधा समय निकल गया.


चक्रों का रहस्य

संजय म्यूजियम
Image Credits: Sadhguru.org

संजय म्यूजियम हॉल के गलियारे के दोनों तरफ कई विशाल कमरे बने हुए हैं, जिनके अंदर कई पौराणिक लिपियाँ, चित्रकलाएं, और ग्रन्थ रखे हुए हैं. इन रहस्य से भरे चित्र और आकृतियों को देखते हुए मेरी नज़र एक ऐसी पेंटिंग पर पढ़ी जिसे मैं शायद तुरंत समझ गया. पर शायद ऐसा मुझे लगा कि मैं समझ गया हूँ. शायद नहीं.

जब पहली बार मैंने उस चित्र को देखा तो वह मानव शरीर की केवल एक रचना नज़र आ रही थी. पर मुझे इस रचना की पूरी अनुभूति अभी नहीं हो पायी थी.
हम सभी ने मनुष्यों के केवल ७ चक्रों के बारे में सुना होगा.मुझे झटका तब लगा जब गाइड ने ७ नहीं ११४ चक्रों का विवरण किया. ११४ चक्रों की ये श्रृंखला ७२००० नाड़ियों से होकर गुज़रती है. मानव शरीर का इतना अद्भुत ज्ञान भारत देश की धरोहरों के आलावा और किसी भी देश में उपलब्ध नहीं है. क्या यह भारत के लिए एक गौरव का विषय नहीं. गाइड आगे रहस्यों के पन्नो को उलटता रहा. मैं अविश्वास से केवल मुँह खुला रखकर इन तथ्यों को सुन सकता था. गाइड के अनुसार हमारे विशुद्धि चक्र यानि गले में वास कर रहे चक्र पर शनिदेव यानि मृत्यु का अधिकार होता है. साधारण मनुष्य का जीवन यहीं से समाप्त होता है. जो मनुष्य योग द्वारा अपनी विशुद्धि चक्र को उजागर कर लेता है, उसके जीवन तथा मृत्यु यमलोक के दायरे से बाहर हो जाती है और मनुष्य खुद आने देहत्याग पर नियंत्रण कर सकता है. शायद यही कारण है की कई वर्षों से तप कर रहे योगी स्वयं समाधि का मार्ग ले सकते हैं. यह मेरे लिए एक अविकल्पनीय रहस्य था. शायद अप्प के लिए भी हो.


हस्तलिपियों का ग्रंथालय

संजय म्यूजियम के उस गलियारों में अभी और भी रहस्य बाकी थे. रहस्यों की इस अद्भुत यात्रा को तय करता हुआ मैं एक ऐसे कमरे में पहुंचा जहाँ केवल अलमारियां ही अलमारियां थी. इन अलमारियों के अंदर रखी थी कई वर्षों पुरानी भारतीय सभ्यता की धरोहर जिनको एक जीवन में जानना और समझ पाना शायद मेरे लिए नामुमकिन है. मेरे प्रश्न जैसे आज रुक नहीं रहे थे. ऐसा लग रहा था मैं अभी अभी पैदा हुआ हूँ, और मुझे कुछ भी इतने सालों में पता नहीं था.

इस ग्रंथालय के अंदर १६ भारतीय भाषाओँ में तथा १८० विषयों पर लगभग १ लाख २५००० ग्रन्थ संभल कर रखे गए हैं. ऐसे अद्भुत ज्ञान से भारत क्यों आज तक अनभिज्ञ है, इस प्रश्न का उत्तर तो शायद मेरे पास नहीं है, पर ये ज़रूर है की भारत एक ऐसी सभ्यता है, जिसने संसार के सबसे ऊंचे ज्ञान पर सिद्धि प्राप्त की है, और वह है, स्वयं का ज्ञान. संसार के इस ज्ञान से परे न कुछ था, न है, और न कभी होगा.


इस एक पोस्ट से संजय म्यूजियम इस रहस्य्मय यात्रा को पूरा कर पाना तो मुश्किल है, और ऐसा करना शायद इस अद्भुत धरोहर का अपमान होगा. इसकी परतों में छुपे हुए बाकी रहस्यों को मैं एक और सफर के लिए छोड़ता हूँ, क्यूंकि शायद एक यात्रा किसी के भी सवाल का पूरा जवाब नहीं देगी. यहाँ के बाकी रहस्यों को ढूंढना मैं आप पर छोड़ता हूँ. शायद आपकी यात्रा कुछ और नए रहस्यों को उजागर करे!


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